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Monday, July 20, 2015

कॉमन मैन

"गोल गप्पे वाला"

रविवार का दिन था, परिवार वालों  की डिमांड हुई की आज गोल गप्पे खाने की इच्छा है । मैंने भी कह दिया चलो शाम को 6 बजे चलते है ।

शाम के 6 बजे गोलगप्पे का ठेला जो की हमारी कॉलोनी के बहार रोड पर ही खड़ा रहता है वहीँ चले गए और देखा तो वहाँ काफी भीड़ थी...लोग हाथ में प्लेट लेकर line में लगे हुए थे।

तकरीबन 15 मिनिट के बाद हमारा भी नम्बर आ गया.... लेकिन उस 15 मिनिट के दौरान हम यह सोचते  रहे  की बेचारा क्या कमाता होगा ??
बेचारा बड़ी मेहनत करता है ??
बेचारा घर का गुजारा कैसे चलाता होगा ??

जब हमारी बारी आई तो मैंने गोल गप्पे वाले से यूँही पूछ लिया -" भाई क्या कमा लेते हो दिन भर में" (मुझे यह उम्मीद थी की 300-400₹ बन जाता होगा गरीब आदमी का )

गोल गप्पे वाला - "साहब जी भगवान की कृपा से माल पूरा लग जाता है "

मैंने पुछा - "मेंरे समझ नही आई  भाई, मतलब जरा अच्छे से समझाओ"

गोल गप्पे वाला - " साहब हम सुबह में 7 बजे घर से 3000 खाली गोलगप्पे की पूरिया लेकर के निकलते है और शाम को 7 बजने से पहले भगवान की किरपा से सब माल लग जाता है "

मैंने हिसाब लगाया की यह 10 ₹ में 6 गोल गप्पे खिलाता है मतलब की 3000 गोल गप्पे बिकने पर उसको 5000 ₹ मिलते होंगे और अगर 50 % उसका प्रॉफिट समझे तो वह दिन के 2500 ₹ या उससे भी ज्यादा कमा लेता है...!!! 😳

यानी की महीने के 75,000 ₹ !!!
😳😳

यह सोचकर तो मेरा दिमाग चकराने लगा.... अब मुझे गोलगप्पे वाला बेचारा नजर नही आ रहा था...बेचारे  तो हम हो गये थे ..!!

एक 7-8 क्लास पढ़ा इन्सान इज्जत के साथ महीने के 75,000 ₹ कमा रहा है... उसने अपना 45 लाख का घर ले लिया है...और 4 दुकाने खरीद कर किराये पर दे रखी है जिनका महीने का किराया 30,000₹ आता है...।

और हमने बरसो  तक पढ़ाई की, उसके बाद 20-25 हजार की नौकरी कर रहे है.... किराये के मकान में रह रहे है... यूँही टाई बांधकर झुठी शानमें घूम रहे हैं... 😔

दिल तो किया की उसी गोलगप्पे में कूदकर डूब जाऊं...

किसी ने सही कहा है ...
"DON'T UNDER ESTIMATE POWER OF THE COMMON MAN "

Monday, June 22, 2015

किसी ने कहा है...

नींद और मौत में क्या फर्क है...?
किसी ने क्या खूबसूरत जवाब दिया है....

 "नींद आधी मौत है"

 और

"मौत मुकम्मल नींद है"

जिंदगी तो अपने ही तरीके से चलती है....

औरों के सहारे तो जनाज़े उठा करते हैं।

 सुबहे होती है , शाम होती है

 उम्र यू ही तमाम होती है ।

 कोई रो कर दिल बहलाता है

और

कोई हँस कर दर्द छुपाता है.

क्या करामात है कुदरत की,

ज़िंदा इंसान पानी में डूब जाता है

और मुर्दा तैर के दिखाता है...

बस के कंडक्टर सी हो गयी है
जिंदगी ।

 सफ़र भी रोज़ का है और
 जाना भी कही नहीं।.....

सफलता के सात भेद, मुझे अपने कमरे के अंदर
 ही उत्तर मिल गये !

छत ने कहा : ऊँचे उद्देश्य रखो !

पंखे ने कहा : ठन्डे रहो !

घडी ने कहा : हर मिनट कीमती है !

शीशे ने कहा : कुछ करने से पहले अपने अंदर झांक
 लो !

खिड़की ने कहा : दुनिया को देखो !

कैलेंडर ने कहा : Up-to-date रहो !

दरवाजे ने कहा : अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के
लिए पूरा जोर लगाओ !

लकीरें भी बड़ी अजीब होती हैं------
माथे पर खिंच जाएँ तो किस्मत बना देती हैं

जमीन पर खिंच जाएँ तो सरहदें बना देती हैं

खाल पर खिंच जाएँ तो खून ही निकाल देती हैं

और रिश्तों पर खिंच जाएँ तो दीवार बना देती हैं..

एक रूपया एक लाख नहीं होता ,

मगर फिर भी एक रूपया एक लाख से निकल जाये तो वो लाख भी लाख नहीं रहता

हम आपके लाखों दोस्तों में बस वही एक रूपया हैं …

संभाल के रखनT , बाकी सब मोह माया है...!

Tuesday, June 16, 2015

समय पर क्रोध

पितामह भीष्म के जीवन का एक ही पाप था कि उन्होंने समय पर क्रोध नहीं किया ...
और
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.
जटायु के जीवन का एक ही पुण्य था कि उसने समय पर क्रोध किया..

परिणामस्वरुप ................
एक को बाणों की शैय्या मिली और एक को प्रभु श्री राम की गोद !

अतः क्रोध तब पुन्य बन जाता है जब वह धर्म और मर्यादा के लिए किया जाए..
और वही क्रोध तब पाप बन जाता है जब वह धर्म और मर्यादा को चोट पहुंचाए..

--शांति तो जीवन का आभूषण है..--

मगर अनीति और असत्य के खिलाफ आपका क्रोध क्षम्य है

प्रेरणा दायक बात

⭕MOTIVATION⭕


एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे
आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं ...

उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें
टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची ...
उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ ...
आवाज आई ...
फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे - छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये धीरे - धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये ,
फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ ... कहा
अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले - हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे ...
फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ
.. अब तो पूरी भर गई है .. सभी ने एक स्वर में कहा ..

सर ने टेबल के नीचे से
चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली , चाय भी रेत के बीच स्थित
थोडी सी जगह में सोख ली गई ...

प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया


इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो ....

टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र , स्वास्थ्य और शौक हैं ,

छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , और

रेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है ..

अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या
कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी ...
ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है ...

यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे
और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय
नहीं रहेगा ...

मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने
बच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ ,
घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको ,
टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है ... पहले तय करो कि क्या जरूरी है
... बाकी सब तो रेत है ..
छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे ..

अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह नहीं बताया
कि " चाय के दो कप " क्या हैं ?

प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले .. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया ...
इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन
अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।

( अपने खास मित्रों और निकट के व्यक्तियों को यह विचार तत्काल बाँट दो .. मैंने अभी - अभी यही किया है)

Sunday, June 14, 2015

शायरी

किसी  शायर  ने  क्या  खूब  कहा  है-
'रिमझिम  तो  है..
मगर  सावन  गायब  है..!
बच्चे  तो  हैं..
मगर  बचपन  गायब  है..!!
क्या  हो  गयी  है
तासीर  ज़माने  की
अपने  तो  हैं..
मगर  अपनापन  गायब  है..!!!

Friday, June 12, 2015

Jokes

मुश्किल है अपना मेल प्रिये
----ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
तुम एम.ए. फर्स्ट डिवीजन हो
----मैं हुआ मैट्रिक फेल प्रिये
तुम फौजी अफसर की बेटी
----मैं तो किसान का बेटा हूं
तुम रबडी खीर मलाई हो
----मैं तो सत्तू सपरेटा हूं
तुम ए.सी. घर में रहती हो
----मैं पेड. के नीचे लेटा हूं
तुम नई मारूति लगती हो
----मैं स्कूटर लम्ब्रेटा हूं
इस तरह अगर हम छुप छुप
-----करआपस में प्यार बढाएंगे
तो एक रोज तेरे डैडी
----अमरीश पुरी बन जाएंगे
सब हड्डी पसली तोड.
----मुझे भिजवा देंगे वो जेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये
----ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
तुम अरब देश की घोड़ी हो
----मैं हूं गदहे की नाल प्रिये
तुम दीवाली का बोनस हो
----मैं भूखों की हड.ताल प्रिये
तुम हीरे जडी तस्तरी हो
----मैं एल्युमिनियम का थाल प्रिये
तुम चिकेन, सूप, बिरयानी हो
----मैं कंकड. वाली दाल प्रिये
तुम हिरन चौकडी भरती हो
----मैं हूं कछुए की चाल प्रिये
तुम चन्दन वन की लकड़ी हो
----मैं हूं बबूल की छाल प्रिये
मैं पके आम सा लटका हूं
----मत मारो मुझे गुलेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये
----ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
मैं शनिदेव जैसा कुरूप
----तुम कोमल कंचन काया हो
मैं तन से, मन से कांशी हूं
----तुम महाचंचला माया हो
तुम निर्मल पावन गंगा हो
----मैं जलता हुआ पतंगा हूं
तुम राजघाट का शांति मार्च
----मैं हिन्दू-मुस्लिम दंगा हूं
तुम हो पूनम का ताजमहल
----मैं काली गुफा अजन्ता की
तुम हो वरदान विधाता का
----मैं गलती हूं भगवन्ता की
तुम जेट विमान की शोभा हो
----मैं बस की ठेलमपेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये
----ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
तुम नई विदेशी मिक्सी हो
----मैं पत्थर का सिलबट्टा हूं
तुम ए.के. सैंतालिस जैसी
----मैं तो इक देसी कट्टा हूं
तुम चतुर राबड़ी देवी सी
----मैं भोला-भाला लालू हूं
तुम मुक्त शेरनी जंगल की
----मैं चिडि.याघर का भालू हूं
तुम व्यस्त सोनिया गांधी सी
----मैं वी.पी. सिंह सा खाली हूं
तुम हंसी माधुरी दीक्षित की
----मैं पुलिस मैन की गाली हूं
गर जेल मुझे हो जाए तो
----दिलवा देना तुम बेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये
----ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
मैं ढाबे के ढांचे जैसा
----तुम पांच सितारा होटल हो
तुम चित्रहार का मधुर गीत
----मैं कृषि दर्शन की झाड़ी हूं
तुम विश्व सुंदरी सी महान
----मैं ठेलिया छाप कबाड़ी हूं
तुम सोनी का मोबाइल हो
----मैं टेलीफोन वाला चोंगा
तुम मछली मानसरोवर की
----मैं सागर तट का हूं घोंघा
दस मंजिल से गिर जाउंगा
----मत आगे मुझे ढकेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये
----ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
तुम जयप्रदा की साडी हो
----मैं शेखर वाली दाढी हूं
तुम सुषमा जैसी विदुषी हो
----मैं लल्लू लाल अनाडी हूं
तुम जया जेटली सी कोमल
----मैं सिंह मुलायम सा कठोर
तुम हेमा मालिनी सी सुंदर
----मैं बंगारू की तरह बोर
तुम सत्ता की महारानी हो
----मैं विपक्ष की लाचारी हूं
तुम हो ममता जयललिता सी
----मैं क्वारा अटल बिहारी हूं
तुम संसद की सुंदरता हो
----मैं हूं तिहाड. की जेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये
----ये प्यार नहीं है खेल प्रिये ।
हसते रहो , हसाते रहो |

Thursday, June 11, 2015

मेरे पिता

जब मैं 3 वर्ष का था तब मैं यह सोचता था की मेरे पिता दुनिया के सबसे मजबूत और ताकतवर इंसान हैं
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जब मैं 6 वर्ष का हुआ तब मैंने महसूस किया की मेरे पिता दुनिया के सबसे ताकतवर ही नहीं सबसे समझदार इंसान भी हैं
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जब मैं 9 वर्ष का हुआ तब मैंने यह महसूस किया की मेरे पिता को दुनिया की हर चीज़ के बारे में ज्ञान है
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जब मैं 12 वर्ष का हुआ तब मैंने यह महसूस करने लगा की मेरे दोस्तों के पिता मेरे पिता से ज्यादा समझदार हैं
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जब मैं 15 वर्ष का हुआ तब मैंने यह महसूस किया की मेरे पिता को दुनिया के साथ चलने के लिए कुछ और ज्ञान की ज़रूरत है
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जब मैं 20 वर्ष का हुआ तब मुझे यह महसूस हुआ की मेरे पिता किसी दूसरी  दुनिया के हैं और यह मेरी सोच के साथ नहीं चल सकते
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जब मैं 25 वर्ष का हुआ तब मैंने यह महसूस किया की मुझे किसी भी काम के बारे में अपने पिता से सलाह नहीं करनी चाहिए क्योंकि उन्हें हर काम में कमी निकलने की आदत सी पड़ गयी है
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जब मैं 30 वर्ष का हुआ तब मैं यह महसूस करने लगा की मेरे पिता को मेरी नक़ल करने से कुछ समझ आ गयी है
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जब मैं 35 वर्ष का हुआ तब मुझे लगा की छोटी मोती बातों में उनसे सलाह ली जा सकती है
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जब मैं 40 वर्ष का हुआ तब मैंने यह महसूस किया की कुछ ज़रूरी बातों में सलाह लेनी चाहिए
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जब मैं 50 वर्ष का हुआ तब मैंने यह फैसला किया की अपने पिता की सलाह के बिना कुछ नहीं करना चाहिए क्योंकि मुझे यह ज्ञान हो चूका है की मेरे पिता दुनिया के सबसे समझदार व्यक्ति हैं पर इससे पहले मैं यह समझ पाता और अपने फैसले पर अमल कर पाता मेरे पिता जी इस संसार को अलविदा कह गए और मैं अपने पिता की हर सलाह और तजुरबे से वंचित रह गया


एक पल की कीमत

1 साल ..की कीमत उस से पूछो
जो फेल हुआ हो ।
1 महीने... ..की कीमत
उस से पूछो
जिसको पिछले महीने तनख्वाह
ना मिली हो ।
1 हफ्ते... ..की कीमत उस से पूछो
जो पूरा हफ्ते अस्पताल में रहा हो।
1 दिन.. ..की कीमत उस से पूछो
जो सारा दिन से भूखा हो ।
1 घंटे.. ..की कीमत उस से पूछो
जिसने किसी का इंतज़ार किया हो।
1 मिनट... ..की कीमत उस से पूछो
जिसकी ट्रेन 1 मिनट से मिस हुई हो।
1 सेकंड.. ..की कीमत उस से पूछो..
जो दुर्घटना से बाल बाल बचा हो।
इसलिये हर पल का शुक्रिया करो ।
लाख टके की बात_
कोई नही देगा साथ तेरा यहॉं
हर कोई यहॉं खुद ही में मशगुल है
जिंदगी का बस एक ही ऊसुल है
यहॉं,
तुझे गिरना भी खुद है
और सम्हलना भी खुद है..